मन को मंदिर बना लिया है,
दीवारें नहीं, बस मौन की ईंटें हैं।
हर कोना धूप-सा उजला,
हर स्पंदन में तेरी आहट की प्रतीक्षा।
पाठ सारे रच लिए हैं,
शब्द अब अर्थ नहीं,
बस तेरी उपस्थिति से
उनमें जीवन भरना बाकी है।
आरती की लौ तो जल उठी है,
पर बाती में तेरा नाम नहीं,
गंध है, स्वर है,
पर तेरे चरणों की थाप अभी नहीं।
भोग बनाना आता है मुझे,
स्वाद, रंग, रस सब जानता हूँ,
पर तेरे लिए जो प्रेम से पका हो,
वह रसोई अभी खुली नहीं।
मैं तैयार हूँ,
हर दिन एक उत्सव है,
बस तू आ जा,
इस मंदिर को मूरत दे दे।
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