खुशियों का खजाना बन कर
तुम चलते हो,
खुले बाज़ार में
मानो कोई सौदागर नहीं,
बल्कि दाता हो—
जो हर चेहरे पर
मुस्कान की रोशनी बिखेर देता है।
लोग पूछते हैं—
कहाँ से कमाया है यह धन?
कहाँ से पाया है यह अमृत?
कहाँ से लाते हो
हृदय लुटाने वाला यह खजाना?
तुम बस मुस्कराते हो,
जैसे उत्तर भीतर ही छिपा हो,
जैसे आनंद का स्रोत
किसी गहरे झरने से फूटता हो,
जहाँ पहुँचने के लिए
सिर्फ़ प्रेम की प्यास चाहिए।
खुशियाँ बाँटते हुए
तुम्हारे हाथ खाली नहीं होते,
बल्कि और भर जाते हैं—
जैसे दीपक से दीपक जलता है
और अंधकार घटता चला जाता है।
Leave a comment